हो जनजाति का इतिहास.
"हो" जनजाति इतिहास.
ऑस्ट्रिक परिवार से संबंध रखने वाली "हो" जनजाति झारखंड के पूर्वी और पष्चिम सिंहभूम जिले में मुख्य रूप से निवसित है। इस जनजाति की भाषा को हो कहा जाता है। इस भाषा को बोलने वाले झारखंड के अलावे पश्चिम बंगाल, असम, ओड़िसा बिहार,छत्तीसगढ, नागालैंड, नेपाल, बांग्लादेश और भारत की हार राज्य में भी पाये जाते हैं। हो भाषा का साहित्य भी काफी समृद्ध रहा है। इस भाषा के लिए एक अलग "वारङचिति लिपि" का आविष्कार भी हुआ है। इस लिपि के निर्माता लाको बोदरा हैं। हो भाषा का विकास 1840 से 1940 ई के बीच रोमन लिपि में लिखित साहित्य के माध्यम से हुआ है। 1905 ई में रेव्ह ए नोतरोत ने ग्रामर ऑफ द कोल लैंग्वेज, 1913 ई में भीमराव सोलंकी की हो ग्रामर, 1915 में लियोनेल बरोज की हो ग्रामर विथ वोकाव्युलरी पुस्तक आयी। हो गीत और कविताओं का सबसे बड़ा संकलन 1942 ई में डब्ल्यू जी आर्चर द्वारा हो दुरंङ प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में माघे पर्व के 557 बरः के 205, हेरो के 97, बापला के 27 और आदि के 49 गीत संकलित हैं। 1941 ई में सतीश कुमार कोड़ा सतीश याः रूमल काव्य पुस्तक, 1945 ई में कान्हू राम देवगम की हो दुरंङ पोथी प्रकाशित हुई। हो साहित्यकारों में योगेन्द्र मुनि, लाको बोदरा, विश्वनाथ बोदरा, अनंत कुमार पिंगुवा, बलराम पाट पिंगुवा, देवेन्द्र नाथ सिंहकु, बी. एल. तामसोय, शंकर लाल गागराई, सीताराम गौड़ आदि का नाम उल्लेखनीय है।
"All India Adivasi Ho Samaj Council"

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