प्रत्येक आदिवासी हो समाज "मागे बोंगा" या "मागे पोरोब" क्यों मानते हैं ?Why do all the Ho Tribal Communities believe in "Mage Bonga" or "Mage Porob"?



तमाम आदिवासी हो समाज "मागे बोंगा" या "मागे पोरोब" क्यों मानते हैं ?

ईश्वर के सम्पूर्ष् रचना के बाद भी लुकु-लुकमि प्रथम दो मानव से संख्या वृध्दि नहीं हो रही थी। सृष्टि रचना का उद्देश्य पूरा नहीं हो रहा था। 

भगवान को चिंता हुई। उन्होंने लीला रची। लुकमि के पेट में दर्द होना शुरू हुआ। दोनों ने अपनी पीड़ा ईश्वर को बताया और उपाय पूछा। तब सर्वप्रथम चावल से इलि-डियङ जाड़िबूटियों के साथ बनाने की विधि से ईश्वर ने अवगत कराया। 

इस इलि-डियङ को उनके निदेशानुसार सर्वप्रथम ईश्वर को ही लुकु-लुकमि ने पूजा (बोंगा) कर अर्पण किया और स्वयं दोनों ने भी आशीर्वाद व प्रसाद के रूप में ग्रहण किया। इसे पीने के बाद मदहोशी में दोनों का पवित्र मिलन हुआ। 

इसके बाद सृष्टि का कार्य आगे बढ़ने की ओर अग्रसर हुआ। इस सृष्टि की याद में "मागे पोरोब्" मनाया जाता है। यह महान महापर्व सम्पूर्ण मानवजाति और ब्रह्मांड के लिए होता है, जिसे आदिवासी हो' समाज ही आज तक परम्परा के रूप में माना रहा है। यह गौरव की बात है। इस फिलोसॉफी (दर्शन व तत्वज्ञान) से दुनिया अनजान हैं।

"सृष्टि की याद में देसाउली रचयिता,पूजा और जीव-जंतु, पेड़-पौधा, ब्रह्मांड की सुख-समृद्धि,समस्त मानव जातियां का खुशहाली रहने के लिए  इस मागे बोंगा" या "मागे पोरोब" मानते हैं".

AIAHS COUNCIL.

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